काठमांडू, 05 अक्टूबर काठमांडू में चर्च की फंडिंग से संचालित ‘भ्रूणका आवाजहरू’ संस्था के बारे में सनसनीखेज खुलासा हुआ है। आरोप है कि 18 से 22 वर्ष की युवतियों को गर्भवती होने को मजबूर किया जाता है। यही नही,ं उनके नवजात बच्चों को गैरकानूनी तरीके से धर्मपुत्र-धर्मपुत्री के रूप में दूसरे परिवारों को सौंपा जाता है। जांच में चर्च और इस संस्था के पदाधिकारियों के इस अवैध गतिविधि में शामिल होने की बात सामने आई है।
बताया गया है कि गर्भवती होने के बाद जो युवतियां यह चाहती थीं कि वह बच्चे को अपने पास नहीं रखना चाहती, उन्हें संस्था के शेल्टर में रखा जाता था। वहां बच्चे को जन्म देने के बाद उसके नवजात को कथित तौर पर कानूनी प्रक्रिया पूरी किए बिना दूसरे लोगों को सौंप दिया जाता था।
नेपाल के प्रचलित कानून के अनुसार नेपाल के भीतर किसी बच्चे को धर्मपुत्र या धर्मपुत्री के रूप में देने के लिए जिला अदालत की अनुमति अनिवार्य है। अदालत कानूनी शर्तों की जांच के बाद ही बच्चे को गोद देने की अनुमति दे सकती है।
जांच के अनुसार, अमेरिकी संस्था ‘लाइफ इंटरनेशनल’, ‘10/40 कनेक्शन’ और नेपाली चर्च समाज की आर्थिक सहायता से चलने वाली इस संस्था में अनचाहे गर्भ वाली युवतियों को शेल्टर में रखा जाता था। बच्चे के जन्म के बाद उन्हें कथित तौर पर दूसरे परिवारों को सौंप दिया जाता था। यह संस्था वर्ष 2009 में पंजीकृत हुई । हालांकि ऐसी गतिविधियां कब से चल रही हैं, इसका पता नहीं चल पाया है।
काठमांडू के गोदावरी नगरपालिका ने 15 अप्रैल 2026 को संस्था का अनुगमन किया। इस दौरान बच्चों को अवैध तरीके से धर्मपुत्र-धर्मपुत्री के रूप में सौंपे जाने की बात सामने आने के बाद नगरपालिका ने रिपोर्ट तैयार की। इस रिपोर्ट को गोपनीय रखा गया। रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि बच्चों को इस तरह सौंपते समय कानूनी प्रावधानों का पालन नहीं किया गया।
जांच में सामने आया कि गर्भवती किशोरियों और युवतियों को शेल्टर में रखा जाता था। प्रसव के लिए उन्हें अस्पताल ले जाया जाता और बच्चे के जन्म के बाद मां और नवजात को अलग कर दिया जाता था। इसके बाद मां से बच्चे को संस्था की देखरेख में रखने संबंधी कागज पर हस्ताक्षर कराए जाते थे। करीब तीन महीने बाद युवती बच्चे को छोड़कर संस्था से बाहर चली जाती थी।
बच्चे संस्था में आने के बाद संस्था के पदाधिकारियों के संपर्क के आधार पर कथित तौर पर बिना किसी कानूनी प्रक्रिया के दूसरे लोगों को सौंप दिए जाते थे। अब तक कितने बच्चों को इस तरह हस्तांतरित किया गया, इसका स्पष्ट आंकड़ा सामने नहीं आया है। हालांकि संस्था के पदाधिकारियों का दावा है कि बच्चों को केवल नेपाल के भीतर ही दिया गया।
जांच में पता चला कि अब तक 27 गर्भवती किशोरियां इस संस्था में रह चुकी हैं। उन्हें चर्च, स्थानीय सरकार या परिचितों के माध्यम से संस्था तक पहुंचाया गया । सबसे गंभीर बात यह सामने आई कि यौन हिंसा का शिकार होकर गर्भवती हुई युवतियां भी संस्था में रही हैं। आरोप है कि ऐसे मामलों में संस्था के पदाधिकारियों ने पुलिस को सूचना देकर आरोपी के खिलाफ कानूनी कार्रवाई कराने के बजाय घटना को गोपनीय रखा। बच्चे के जन्म के बाद बच्चे को अपने पास रख लिया जाता था और मां को संस्था से भेज दिया जाता था।
संस्था की वर्तमान अध्यक्ष सुजन कुंवर ने दावा किया कि पीड़ित युवतियां खुद आरोपी पुरुषों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई नहीं चाहती थीं। उन्होंने अपने बयान में कहा कि संस्था का उद्देश्य गर्भपात को हतोत्साहित करना और महिलाओं को बच्चे को जन्म देने के लिए प्रोत्साहित करना है। कुंवर ने बच्चों को दूसरे परिवारों को सौंपे जाने की बात स्वीकार की है। हालांकि इस प्रक्रिया में कोई निर्धारित कानूनी प्रक्रिया पूरी किए जाने का उल्लेख नहीं मिला।
उनके अनुसार, बच्चे को किसी तीसरे व्यक्ति को देने के लिए पहले उसे किशोरी के अभिभावकों को सौंपा जाता था और फिर अभिभावकों के माध्यम से तीसरे व्यक्ति के नाम पर कागजी प्रक्रिया की जाती थी। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि इस तरह बच्चे को गैरकानूनी तरीके से सौंपे जाने के बाद जन्म पंजीकरण भी नए परिवार के नाम पर किया जाता था।
रिपोर्ट में दर्ज उनके बयान के अनुसार मां और नवजात के बीच भावनात्मक संबंध बनने से रोकने के लिए बच्चे को जन्म के 7 से 10 दिनों के भीतर ही मां से अलग कर दिया जाता था। मां को हल्दी वाला पानी पिलाकर दूध सुखाने और बच्चे को ‘लैक्टोजिन’ देने की बात भी स्वीकार की गई है।
संस्था के निदेशक सोनाम राई ने भी धर्मसंतान के रूप में बच्चों को दिए जाने के दौरान कानूनी प्रक्रिया पूरी नहीं किए जाने की बात स्वीकार की है। रिपोर्ट में उनके बयान के अनुसार उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि “किस कानून के आधार पर बच्चों को हस्तांतरित किया जाता है, इसकी जानकारी नहीं है।” उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि संस्था से धर्मसंतान के रूप में दिए गए बच्चों को वापस लाया जा सकता है, लेकिन अब तक उनकी कोई निगरानी नहीं की गई है।
संस्था की सह सचिव विमला खत्री ने भी अनुगमन के दौरान कहा कि नवजात बच्चों को दूसरे लोगों को सौंपने की कानूनी प्रक्रिया के बारे में संस्था को जानकारी नहीं थी। उन्होंने बताया कि संस्था में पारिवारिक समस्या, प्रेम संबंध या शोषण के कारण गर्भवती हुई युवतियां आती हैं। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि संस्था की ओर से यौन हिंसा के आरोपियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई के लिए पुलिस में शिकायत दर्ज नहीं कराई जाती थी।
संस्था की अध्यक्ष कुंवर ने दावा किया कि संस्था मानवीय आधार पर काम करती है और इसमें कोई आर्थिक लेन-देन नहीं होता। लेकिन जांच में कानूनी प्रक्रिया की अनदेखी सामने आने के कारण इस दावे पर सवाल उठे हैं। रिपोर्ट के अनुसार संस्था का दावा है कि जिन लोगों को बच्चे सौंपे गए, उनका रिकॉर्ड तो रखा गया है, लेकिन बच्चों की वर्तमान स्थिति क्या है, इसकी निगरानी नहीं की गई।
गोदावरी नगरपालिका में कार्यालय वाली इस संस्था ने ‘मातृ शिशु गृह’ संचालन और क्षमता विकास संबंधी काम करने का उल्लेख अपने ऑडिट रिपोर्ट में किया है। संस्था के अध्यक्ष सुशासन राई हैं, जबकि प्रशासनिक काम कार्यकारी निदेशक सोमन राई के घर से संचालित होने की बात सामने आई है।
संस्था के प्रमुख आर्थिक स्रोतों में अमेरिका स्थित दाता संस्था तथा नेपाली चर्च समाज से मिलने वाली विदेशी सहायता और वस्तुगत सहयोग शामिल हैं। नेपाली चर्च समाज में आय का 10 प्रतिशत देने की व्यवस्था के माध्यम से भी संस्था को सहायता मिलने की बात सामने आई है।
जिन लोगों ने बच्चों को लिया, उनमें अधिकांश संस्था के पदाधिकारियों के परिचित या बिचौलियों के माध्यम से संपर्क में आए थे। हालांकि उनके पारिवारिक हालात की जानकारी सामने नहीं आई। जबकि धर्मपुत्र या धर्मपुत्री देने से पहले परिवार की आर्थिक और सामाजिक स्थिति की जांच आवश्यक होती है। अनुगमन के दौरान मिले तथ्यों और ‘भ्रूण नेपाल’ के पदाधिकारियों एवं कर्मचारियों के बयानों के आधार पर संस्था की गतिविधियों को बेहद संदिग्ध बताया गया है। उनके बयानों से भी कई सवाल खड़े हुए हैं