काठमांडू, 04 नवंबर । नेपाल की बालेन्द्र शाह के नेतृत्व में रही सरकार द्वारा अपनी ही पार्टी राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (आरएसपी) के द्वारा दिए गए निर्देशों और नीतियों की पालन करने में आनाकानी और अनदेखी करने से सरकार और पार्टी के बीच दूरी बढ़ती हुई दिख रही है।
सत्तारूढ़ आरएसपी ने सरकार के सामने कई महत्वपूर्ण विषयों पर बार-बार अपनी चिंताएं रखी हैं और कई बार चेतावनी के साथ निर्देश भी जारी किए हैं। लेकिन पार्टी की इन मांगों और हस्तक्षेपों को बड़े पैमाने पर अनसुना किया गया है। पार्टी ने लोकतांत्रिक मान्यताओं के खिलाफ मानी जाने वाली गतिविधियों पर चिंता जताई है। हालांकि, पीएम शाह ने पार्टी के इन निर्देशों की हमेशा ही अनदेखी की है।
गत 13 जुलाई को मीडिया संस्थानों, कारोबारी प्रतिष्ठानों और नेपाली कांग्रेस अध्यक्ष के आवास के सामने वाहन खड़े कर रास्ता बाधित किया गया था। बताया गया कि इस घटना में सरकार से जुड़े लोग शामिल थे।
मीडिया संस्थानों के प्रवेश द्वारों पर वाहन खड़े किए जाने की खबरें सामने आने के तुरंत बाद आरएसपी के महासचिव बिपिन आचार्य ने बयान जारी कर सरकार का ध्यान इस मामले की ओर आकर्षित किया। उन्होंने मीडिया संस्थानों के प्रवेश द्वारों पर वाहन खड़े कर रास्ता रोकने वालों की पहचान कर उनके खिलाफ कार्रवाई करने की मांग की थी।
ऑनलाइन खबर, हिमालय टेलीविजन और कान्तिपुर जैसे बड़े मीडिया संस्थानों के प्रवेश द्वारों पर कथित तौर पर सरकार के करीबी लोगों ने वाहन खड़े किए थे। प्रधानमंत्री शाह के करीबी लोगों ने इस कार्रवाई का बचाव करते हुए कहा कि यह पासपोर्ट विभाग के सामने गणेश नेपाली द्वारा आत्मदाह किए जाने के बाद मीडिया संस्थानों की खुले स्थानों पर पार्किंग के समर्थन में अपनाई गई स्थिति के जवाब में किया गया था।
प्रधानमंत्री के करीबी लोगों ने जहां रास्ता बाधित करने की कार्रवाई को सही ठहराया, वहीं पार्टी ने इसका विरोध किया। आचार्य ने कहा कि स्वतंत्र और निर्भीक पत्रकारिता लोकतंत्र की जीवनरेखा है।
बयान में कहा गया, \"राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी इसकी रक्षा के लिए हमेशा प्रतिबद्ध है। इसलिए पार्टी प्रेस को डराने-धमकाने के उद्देश्य से की गई इन और ऐसी किसी भी अन्य कार्रवाई की निंदा करती है।\"
आरएसपी ने कहा कि राज्य के चौथे स्तंभ के रूप में मीडिया संस्थानों और पत्रकारों को निर्भीक होकर काम करने के लिए आवश्यक वातावरण को कमजोर करने के उद्देश्य से की जाने वाली संदिग्ध और अस्पष्ट गतिविधियां लोकतांत्रिक मूल्यों का सीधा उल्लंघन हैं।
मीडिया के साथ किए जा रहे व्यवहार पर चिंता जताते हुए आरएसपी ने सरकार से इसमें शामिल लोगों के खिलाफ कार्रवाई करने का आग्रह किया था।
बयान में कहा गया, \"हम नेपाल सरकार, गृह मंत्रालय और संबंधित सुरक्षा एजेंसियों का गंभीर ध्यान इस ओर आकर्षित करते हैं कि वे मीडिया संस्थानों की भौतिक और मानसिक सुरक्षा सुनिश्चित करें तथा ऐसी संदिग्ध गतिविधियों में शामिल किसी भी व्यक्ति की तत्काल पहचान कर कानून के अनुसार कार्रवाई करें।\"
पार्टी के हस्तक्षेप के बावजूद पीएम बालेन्द्र शाह के नेतृत्व वाली सरकार ने इस घटना की जांच करने या जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई करने का कोई स्पष्ट प्रयास नहीं किया। प्रधानमंत्री शाह के मुख्य सलाहकार कुमार बेन और गृह मंत्री सुदन गुरुङ के करीबी लोग भी कथित तौर पर मीडिया संस्थानों के रास्ते रोकने के लिए वाहन खड़े करने में शामिल थे।
मीडिया संस्थानों द्वारा वाहन मालिकों की पहचान कर अधिकारियों को जानकारी दिए जाने के बाद भी कोई कार्रवाई शुरू नहीं की गई।
पिछले सप्ताह भी यही स्थिति दोहराई गई, जब सुरक्षा कर्मियों ने मीडिया संस्थानों में प्रवेश कर पत्रकारों के साथ दुर्व्यवहार किया। नेपाल प्रेस के पत्रकार विश्वमणि सुबेदी को हिरासत में लिया गया और बाद में रिहा कर दिया गया। पुलिस ने नया पत्रिका के कार्यालय में भी बिना गिरफ्तारी वारंट के उसके एक पत्रकार को हिरासत में लेने के लिए पहुंची थी।
30 अक्टूबर को पुलिस ने मोटिवेट न्यूज के संपादक शोभराज बराल और डीएनए खबर के प्रधान संपादक धीरज बस्नेत को गिरफ्तार किया।
इस घटना पर सरकार की प्रतिक्रिया और भी गैरजिम्मेदाराना रही। प्रधानमंत्री सचिवालय ने मामले से शाह को अलग करते हुए कहा कि उन्हें पत्रकारों की गिरफ्तारी की जानकारी नहीं थी। वहीं, पुलिस प्रशासन ने दावा किया कि पत्रकारों को प्रधानमंत्री कार्यालय के निर्देश पर हिरासत में लिया गया था।
आरएसपी ने पत्रकारों की गिरफ्तारी और सुरक्षा कर्मियों के मीडिया संस्थानों में प्रवेश पर तत्काल आपत्ति जताई। 30 अक्टूबर को पार्टी नेताओं ने सोशल मीडिया पर कई पोस्ट जारी कर पूर्ण प्रेस स्वतंत्रता के प्रति अपना समर्थन दोहराया।
पार्टी ने सचिवालय की आपात बैठक भी बुलाई। बैठक में पुलिस प्रशासन की कार्रवाई को असंवैधानिक ठहराते हुए सरकार को घटना की जांच करने और जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई करने का निर्देश दिया गया।
बैठक के निर्णय में कहा गया, \"30 अक्टूबर को पुलिस प्रशासन द्वारा मीडिया क्षेत्र में की गई कुछ गतिविधियां, जो एक मजबूत और जवाबदेह लोकतंत्र का स्तंभ माना जाता है, संविधान और पार्टी के मूल आदर्शों के विपरीत हैं। राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी सरकार को निर्देश देती है कि गैरजिम्मेदाराना आदेश जारी करने वालों की तत्काल पहचान कर जांच की जाए और उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए।\"
एक बार फिर सरकार ने पार्टी के निर्देश की अनदेखी की। निर्णय पर ध्यान देने के बजाय प्रधानमंत्री शाह के मुख्य सलाहकार कुमार बेन ने सोशल मीडिया पर इस मुद्दे को हल्के में लिया। सरकार ने पत्रकारों की गिरफ्तारी या मीडिया कार्यालयों में सुरक्षा कर्मियों के प्रवेश की जांच किए बिना ही ध्यान दूसरी ओर मोड़ दिया।
13 अक्टूबर को आचार्य ने बयान जारी कर सरकार से पत्रकारों की गिरफ्तारी को लेकर एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी और एक विवादित बिचौलिए के बीच हुई बातचीत का ऑडियो रिकॉर्डिंग की गंभीरता को समझने और जांच सुनिश्चित करने का आग्रह किया था। बयान में कहा गया, \"हमें विश्वास है कि संबंधित सरकारी एजेंसियां शीघ्र ही स्वतंत्र, निष्पक्ष और तथ्यों पर आधारित जांच करेंगी। हम सरकारी एजेंसियों द्वारा की जाने वाली जांच प्रक्रिया में पार्टी की ओर से पूर्ण सहयोग का आश्वासन देते हैं।\"
लेकिन इस अपील का भी सरकार पर कोई असर नहीं हुआ और सरकार ने पत्रकारों की धड़पकड़ करने के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की। इसी के बाद अब पार्टी के अध्यक्ष रवि लामिछाने और अन्य पदाधिकारी सरकार के रवैये से नाराज दिखाई दे रहे हैं।
पार्टी के प्रवक्ता मनीष झा ने कहा कि पार्टी के निर्देशों की अनदेखी करना सरकार के लिए ठीक संकेत नहीं है। झा ने कहा कि यदि सरकार अपनी ही मनमानी करती रही और पार्टी निर्देशों का पालन नही किया तो पार्टी नेतृत्व को इस बारे में गंभीरता पूर्वक सोचने पर मजबूर होना होगा।