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आदित्य-L1 ने सौर विस्फोटों के असमान विस्तार का लगाया पता, अंतरिक्ष मौसम के अध्ययन में मिलेगी मदद

Posted on: 2026-11-03
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भारत की पहली अंतरिक्ष-आधारित सौर वेधशाला आदित्य-L1 ने सूर्य से निकलने वाले विस्फोटों यानी कोरोनल मास इजेक्शन (सीएमई) के विस्तार को लेकर अहम जानकारी दी है। आदित्य-L1 पर लगे विजिबल एमिशन लाइन कोरोनाग्राफ (VELC) के आंकड़ों से वैज्ञानिकों ने पता लगाया है कि सौर विस्फोट का विस्तार सभी दिशाओं में एक समान नहीं होता, बल्कि इसका आकार असममित हो सकता है। इस खोज से अंतरिक्ष मौसम के अध्ययन और पृथ्वी पर उपग्रहों तथा संचार नेटवर्क पर पड़ने वाले संभावित प्रभावों को समझने में मदद मिल सकती है।

सीएमई का विस्तार सभी दिशाओं में एक समान नहीं

सितंबर 2023 में लॉन्च किया गया आदित्य-L1 फिलहाल सूर्य-पृथ्वी के एल1 बिंदु पर काम कर रहा है और लगातार सूर्य का अवलोकन कर रहा है। इसमें सात पेलोड लगे हैं, जिनमें VELC प्रमुख पेलोड है। यह सूर्य के बाहरी वायुमंडल यानी कोरोना का अलग-अलग तरीकों से एक साथ अध्ययन करने के लिए तैयार किया गया है।

भारतीय खगोल भौतिकी संस्थान (आईआईए) के वैज्ञानिकों ने आदित्य-L1 के VELC से मिले आंकड़ों को नासा के सोलर डायनेमिक्स ऑब्जर्वेटरी (SDO) अंतरिक्ष यान के आंकड़ों और त्रि-आयामी मॉडलिंग के साथ मिलाकर सौर विस्फोट की संरचना और गति का अध्ययन किया। यह अध्ययन ‘एस्ट्रोफिजिकल जर्नल लेटर्स’ में प्रकाशित हुआ है।

अध्ययन में पहली बार सामने आया कि सीएमई सूर्य से किसी सामान्य गोलाकार बुलबुले की तरह समान रूप से बाहर नहीं फैलता। इसके बजाय इसका विस्तार अलग-अलग दिशाओं में असमान होता है, जिससे इसका आकार असममित बन जाता है। विस्तार में यह अंतर पृथ्वी की ओर बढ़ते समय सीएमई की गति को प्रभावित कर सकता है और अंतरिक्ष मौसम में गड़बड़ी पैदा कर सकता है।

VELC के आंकड़ों से प्लाज्मा की गति का चला पता

VELC कोरोना में अत्यधिक आयनित लौह परमाणुओं से निकलने वाली 530.3 नैनोमीटर की हरी उत्सर्जन रेखा के जरिए शुरुआती सीएमई का अध्ययन करता है। यह उत्सर्जन करीब 18 लाख केल्विन तापमान वाले गर्म प्लाज्मा की जानकारी देता है। इस रेखा की डॉप्लर शिफ्ट यानी तरंगदैर्ध्य में बदलाव से वैज्ञानिकों को यह पता लगाने में मदद मिलती है कि प्लाज्मा हमारी दिशा में आ रहा है या हमसे दूर जा रहा है।

आईआईए के पीएचडी शोधार्थी और अध्ययन के प्रमुख लेखक सौरभ त्रिपाठी ने बताया कि वैज्ञानिकों ने 5 अगस्त 2024 को हुए सीएमई का अध्ययन VELC और नासा के SDO में लगे एटमॉस्फेरिक इमेजिंग असेंबली (AIA) के आंकड़ों के आधार पर किया। यह विस्फोट सूर्य के पश्चिमी किनारे के पास स्थित एक सक्रिय क्षेत्र से निकला था। VELC के स्पेक्ट्रोस्कोपिक आंकड़ों में नीली और लाल दिशा में खिसकी उत्सर्जन रेखाएं दिखाई दीं, जो क्रमशः हमारी ओर और हमसे दूर जा रहे प्लाज्मा की गति को दर्शाती हैं।

आईआईए के सौर खगोलशास्त्री और अध्ययन के संबंधित लेखक तन्मय सामंत ने बताया कि AIA की तस्वीरों से सीएमई के आकाश में आगे बढ़ने की जानकारी मिली, जबकि VELC ने इसके हमारी ओर और हमसे दूर जाने की गति को सामने रखा। दोनों के आंकड़ों को मिलाकर वैज्ञानिकों ने इसके असमान विस्तार और असममित आकार की पहचान की।

आईआईए के वैज्ञानिक जयंत जोशी और उनकी टीम ने VELC में दिखाई दिए असामान्य स्पेक्ट्रल पैटर्न को समझने के लिए सीएमई का त्रि-आयामी ज्यामितीय और गतिज मॉडल तैयार किया। मॉडल से पता चला कि सममित विस्तार के आधार पर देखे गए पैटर्न को नहीं समझाया जा सकता। इसके बजाय, झुकी हुई सीएमई धुरी और असमान पार्श्व विस्तार वाला मॉडल वास्तविक आंकड़ों से मेल खाता है।

वैज्ञानिक अब इसी तकनीक का इस्तेमाल दूसरे सीएमई के अध्ययन में करने की योजना बना रहे हैं। इससे अंतरिक्ष में मौजूद कई दूरबीनों से एक साथ तस्वीरें लिए बिना भी सौर विस्फोटों की गति और संरचना का पुनर्निर्माण किया जा सकेगा। खासतौर पर सूर्य के निचले कोरोना में यह तकनीक उपयोगी हो सकती है, जहां सीएमई तेजी से विकसित होते हैं और केवल तस्वीरों से हमारी दृष्टि की दिशा में उनकी गति का पता लगाना मुश्किल होता है।

अध्ययन के सह-लेखक जयंत जोशी के अनुसार, शुरुआती चरण में सीएमई का असममित आकार सौर पवन के साथ उसकी परस्पर क्रिया और अंतरिक्ष में आगे बढ़ते समय उस पर लगने वाले प्रतिरोध को प्रभावित कर सकता है। इससे उसकी गति और अंततः पृथ्वी तक पहुंचने के समय पर असर पड़ सकता है।

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