भारत
में दिल की बीमारियों का खतरा तेजी से बढ़ रहा है। चिंता की बात यह है कि अब हृदय
संबंधी समस्याएं केवल बुजुर्गों तक सीमित नहीं रह गई हैं, बल्कि कम उम्र के युवा भी इसकी
चपेट में आ रहे हैं। जिस उम्र में लोगों को अपने करियर, परिवार
और भविष्य पर ध्यान देना चाहिए, उसी उम्र में हार्ट अटैक
जैसी गंभीर समस्या सामने आने लगी है। विशेषज्ञों के अनुसार, भारतीयों
में हृदय रोग पश्चिमी देशों की तुलना में लगभग पांच से 10 साल
पहले दिखाई दे सकते हैं। कुछ मामलों में 25 साल की उम्र के
युवाओं में भी ऐसे जोखिम देखने को मिल रहे हैं, जो पहले अधिक
उम्र के लोगों में आम माने जाते थे। करवा चौथ पर खूबसूरती बढ़ाएंगे ये घरेलू नुस्खे
ज़्यादा जानें Hindi इस बदलाव के पीछे कई कारण हो सकते
हैं। इनमें पेट के आसपास जमा होने वाली अंदरूनी चर्बी, आनुवंशिक
प्रवृत्ति, असंतुलित खानपान, शारीरिक
गतिविधियों की कमी, तनाव, धूम्रपान और
खराब नींद जैसी आदतें शामिल हैं। कई बार व्यक्ति बाहर से दुबला-पतला और स्वस्थ
दिखाई देता है, लेकिन उसके शरीर के भीतर ऐसे जोखिम मौजूद
होते हैं, जिनका पता सामान्य तौर पर नहीं चल पाता। पेट की
अंदरूनी चर्बी क्यों है खतरनाक? पेट के आसपास जमा होने वाली
चर्बी को केवल शरीर के आकार या वजन से नहीं समझा जा सकता। त्वचा के नीचे जमा चर्बी
के अलावा पेट के भीतर अंगों के आसपास भी वसा जमा हो सकती है। इसे विसरल फैट यानी
आंतरिक चर्बी कहा जाता है। इसकी अधिक मात्रा शरीर में सूजन और मेटाबॉलिज्म से
जुड़ी समस्याओं को बढ़ा सकती सऊदी अरब में बुनियादी ढांचे पर हमले: भारत ने
की कड़ी निंदा अंदरूनी चर्बी बढ़ने पर इंसुलिन प्रतिरोध, टाइप-2
डायबिटीज, उच्च रक्तचाप और रक्त में खराब
कोलेस्ट्रॉल या ट्राइग्लिसराइड्स का स्तर बढ़ने का खतरा हो सकता है। ये सभी
स्थितियां धमनियों में प्लाक जमा होने और रक्त प्रवाह प्रभावित होने से जुड़ी हैं।
जब हृदय तक रक्त पहुंचाने वाली धमनियों में रुकावट पैदा होती है, तो हार्ट अटैक का जोखिम बढ़ सकता है। यही वजह है कि केवल वजन या शरीर के
बाहरी आकार को देखकर हृदय स्वास्थ्य का अंदाजा लगाना सही नहीं है। कम उम्र के
लोगों को भी अपनी कमर के माप, ब्लड प्रेशर, ब्लड शुगर और कोलेस्ट्रॉल पर ध्यान देना चाहिए। लौकी-गाजर
और दाल से बनाएं हेल्दी पराठे आनुवंशिक कारण भी बढ़ा सकते हैं खतरा हार्ट अटैक का
जोखिम केवल खानपान और जीवनशैली से तय नहीं होता। कुछ लोगों में आनुवंशिक कारण भी
अहम भूमिका निभाते हैं। ऐसा ही एक कारक है लिपोप्रोटीन (ए), जिसे
आमतौर पर एलपी(ए) कहा जाता है। यह खून में पाया जाने वाला एक कण है, जिसका स्तर काफी हद तक आनुवंशिक रूप से निर्धारित होता है। एलपी(ए) का
स्तर अधिक होने पर हृदय और रक्त वाहिकाओं से जुड़ी बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है।
खास बात यह है कि सामान्य कोलेस्ट्रॉल रिपोर्ट ठीक होने के बावजूद कुछ लोगों में
एलपी(ए) अधिक हो सकता है। इसलिए जिन परिवारों में कम उम्र में हार्ट अटैक, स्ट्रोक या अन्य हृदय रोगों का इतिहास रहा हो, उन्हें
डॉक्टर से व्यक्तिगत जोखिम के बारे में सलाह लेनी चाहिए। झीलों
पर उतरेंगे पंखों वाले मेहमान, इन जगहों पर यादगार होगी बर्ड
वॉचिंग एलपी(ए) की जांच हर व्यक्ति के लिए बार-बार जरूरी नहीं होती, लेकिन चिकित्सक पारिवारिक इतिहास और दूसरे जोखिम कारकों को देखते हुए इसकी
जांच की सलाह दे सकते हैं। इसके स्तर को समझना खास तौर पर उन लोगों के लिए उपयोगी
हो सकता है, जिनके परिवार में कम उम्र में हृदय रोग के मामले
सामने आए हों। स्वस्थ दिखने वाले युवा भी रहें सतर्क कई युवा नियमित रूप से काम
करते हैं, खेलते हैं और अपनी दिनचर्या में सक्रिय रहते हैं।
इसके बावजूद केवल सक्रिय दिखना इस बात की गारंटी नहीं है कि उन्हें हृदय रोग का
खतरा नहीं है। अगर किसी व्यक्ति में आनुवंशिक जोखिम, उच्च
रक्तचाप, डायबिटीज, धूम्रपान या असामान्य
कोलेस्ट्रॉल मौजूद है, तो कम उम्र में भी हृदय संबंधी
परेशानी हो सकती है। इसके अलावा, लंबे समय तक बैठे रहना,
फास्ट फूड और अत्यधिक प्रसंस्कृत भोजन का सेवन, पर्याप्त नींद न लेना तथा लगातार मानसिक तनाव में रहना भी स्वास्थ्य पर
असर डाल सकता है। हालांकि हर हार्ट अटैक के पीछे एक ही कारण नहीं होता। अलग-अलग
लोगों में जोखिम का स्तर उनकी मेडिकल हिस्ट्री और जीवनशैली के आधार पर बदल सकता
है। हार्ट अटैक से बचाव के लिए क्या करें? दिल को स्वस्थ
रखने के लिए कम उम्र से ही कुछ आदतें अपनाना जरूरी है। 1. संतुलित
भोजन करें: भोजन में सब्जियां, फल, साबुत
अनाज, दालें और फाइबर से भरपूर चीजें शामिल करें। अधिक नमक,
मीठे पेय, ट्रांस फैट और अत्यधिक तले हुए भोजन
का सेवन सीमित रखें। 2. नियमित व्यायाम करें: अपनी क्षमता और
स्वास्थ्य के अनुसार सप्ताह में कम से कम 150 मिनट मध्यम
तीव्रता वाली शारीरिक गतिविधि करने का लक्ष्य रखें। लंबे समय तक लगातार बैठने से
बचें। 3. पेट की चर्बी पर ध्यान दें: केवल वजन ही नहीं,
कमर के माप और अन्य मेटाबॉलिक जोखिमों की भी निगरानी करें। जरूरत
पड़ने पर डॉक्टर या आहार विशेषज्ञ की मदद लें। 4. नियमित
स्वास्थ्य जांच कराएं: ब्लड प्रेशर, ब्लड शुगर और लिपिड
प्रोफाइल की जांच उम्र, पारिवारिक इतिहास और अन्य जोखिमों के
अनुसार कराएं। एलपी(ए) जांच की जरूरत के बारे में डॉक्टर से पूछ सकते हैं। 5.
धूम्रपान से दूर रहें: तंबाकू और धूम्रपान रक्त वाहिकाओं को नुकसान
पहुंचा सकते हैं और हृदय रोग का खतरा बढ़ाते हैं। पर्याप्त नींद और तनाव को
नियंत्रित करने की कोशिश भी जरूरी है। इन लक्षणों को न करें नजरअंदाज सीने में
दबाव या जकड़न, सांस फूलना, ठंडा पसीना,
अचानक कमजोरी, चक्कर आना या दर्द का बांह,
पीठ, गर्दन अथवा जबड़े तक फैलना हार्ट अटैक के
संभावित संकेत हो सकते हैं। हर व्यक्ति में लक्षण एक जैसे नहीं होते। ऐसे संकेत
अचानक दिखाई दें, तो उम्र कम होने या लक्षणों को गैस समझकर
नजरअंदाज न करें। तुरंत आपातकालीन चिकित्सा सहायता लें। समय पर सावधानी से कम हो
सकता है जोखिम भारत में कम उम्र में हृदय रोगों को लेकर बढ़ती चिंता यह बताती है
कि दिल की सेहत पर ध्यान देने की शुरुआत बुजुर्गावस्था में नहीं, बल्कि युवावस्था से होनी चाहिए। पेट की अंदरूनी चर्बी, आनुवंशिक जोखिम और जीवनशैली से जुड़े कारकों को समय रहते पहचानकर कई
जोखिमों को नियंत्रित किया जा सकता है। हालांकि, हर युवा को
हार्ट अटैक होगा, ऐसा नहीं है और न ही केवल पेट की चर्बी या
एलपी(ए) के आधार पर किसी व्यक्ति के भविष्य का सटीक अनुमान लगाया जा सकता है। सही
जानकारी, जरूरत के अनुसार जांच, नियमित
शारीरिक गतिविधि और चिकित्सकीय सलाह से हृदय स्वास्थ्य को बेहतर बनाए रखने में मदद
मिल सकती है।