कभी-कभी जिंदगी इंसान के सामने ऐसी चुनौतियां खड़ी कर देती है, जिनके सामने हौसला भी कमजोर पड़ने लगता है। लेकिन कुछ लोग अपनी मेहनत, दृढ़ इच्छाशक्ति और आत्मविश्वास से मुश्किलों को पीछे छोड़कर इतिहास रच देते हैं। प्रणव सूरमा की कहानी भी कुछ ऐसी ही प्रेरणादायक है। रीढ़ की हड्डी में गंभीर चोट लगने के बाद उनके शरीर की गतिविधियों पर गहरा असर पड़ा और रोजमर्रा के कई काम उनके लिए चुनौती बन गए। ऐसी परिस्थितियों में जिंदगी को दोबारा सामान्य रूप से जीना और अपने सपनों को पूरा करने की राह पर आगे बढ़ना आसान नहीं होता। लेकिन प्रणव ने हार मानने के बजाय अपने हौसले को अपनी सबसे बड़ी ताकत बनाया। उन्होंने खेल को अपने जीवन का लक्ष्य बनाया और लगातार मेहनत करते हुए खुद को एक खिलाड़ी के रूप में तैयार किया। उनकी यात्रा केवल शारीरिक कठिनाइयों से मुकाबला करने की कहानी नहीं है, बल्कि मानसिक मजबूती, अनुशासन और कभी हार न मानने वाले जज्बे की मिसाल भी है।
प्रणव सूरमा का जन्म हरियाणा के फरीदाबाद में हुआ। महज 16 साल की उम्र में एक दुर्घटना के दौरान सीमेंट की शीट गिरने से उनकी रीढ़ की हड्डी में गंभीर चोट आई, जिसके कारण उन्हें लकवे का सामना करना पड़ा। कई महीनों तक अस्पताल में रहने के बाद भी उन्होंने अपने जीवन को नई दिशा देने का फैसला किया। दोस्तों से पैरा खेलों के बारे में जानने के बाद उन्होंने खेल की दुनिया में कदम रखा और क्लब थ्रो को अपना प्रमुख इवेंट बनाया। वर्ष 2023 में हांगझोऊ एशियन पैरा गेम्स में उन्होंने 30.01 मीटर दूर क्लब थ्रो करके स्वर्ण पदक जीता और एशियाई खेलों का रिकॉर्ड बनाया। इसके बाद पेरिस पैरालंपिक 2024 में उन्होंने रजत पदक हासिल कर दुनिया को अपनी प्रतिभा का परिचय दिया। अक्टूबर 2026 में एशियन पैरा गेम्स में उन्होंने डिस्कस थ्रो की स्पर्धा में भी स्वर्ण पदक जीतकर नया एशियाई रिकॉर्ड बनाया।
कभी-कभी जिंदगी इंसान के सामने ऐसी चुनौतियां खड़ी कर देती है, जिनके सामने हौसला भी कमजोर पड़ने लगता है। लेकिन कुछ लोग अपनी मेहनत, दृढ़ इच्छाशक्ति और आत्मविश्वास से मुश्किलों को पीछे छोड़कर इतिहास रच देते हैं। प्रणव सूरमा की कहानी भी कुछ ऐसी ही प्रेरणादायक है। रीढ़ की हड्डी में गंभीर चोट लगने के बाद उनके शरीर की गतिविधियों पर गहरा असर पड़ा और रोजमर्रा के कई काम उनके लिए चुनौती बन गए। ऐसी परिस्थितियों में जिंदगी को दोबारा सामान्य रूप से जीना और अपने सपनों को पूरा करने की राह पर आगे बढ़ना आसान नहीं होता। लेकिन प्रणव ने हार मानने के बजाय अपने हौसले को अपनी सबसे बड़ी ताकत बनाया। उन्होंने खेल को अपने जीवन का लक्ष्य बनाया और लगातार मेहनत करते हुए खुद को एक खिलाड़ी के रूप में तैयार किया। उनकी यात्रा केवल शारीरिक कठिनाइयों से मुकाबला करने की कहानी नहीं है, बल्कि मानसिक मजबूती, अनुशासन और कभी हार न मानने वाले जज्बे की मिसाल भी है।
प्रणव सूरमा का जन्म हरियाणा के फरीदाबाद में हुआ। महज 16 साल की उम्र में एक दुर्घटना के दौरान सीमेंट की शीट गिरने से उनकी रीढ़ की हड्डी में गंभीर चोट आई, जिसके कारण उन्हें लकवे का सामना करना पड़ा। कई महीनों तक अस्पताल में रहने के बाद भी उन्होंने अपने जीवन को नई दिशा देने का फैसला किया। दोस्तों से पैरा खेलों के बारे में जानने के बाद उन्होंने खेल की दुनिया में कदम रखा और क्लब थ्रो को अपना प्रमुख इवेंट बनाया। वर्ष 2023 में हांगझोऊ एशियन पैरा गेम्स में उन्होंने 30.01 मीटर दूर क्लब थ्रो करके स्वर्ण पदक जीता और एशियाई खेलों का रिकॉर्ड बनाया। इसके बाद पेरिस पैरालंपिक 2024 में उन्होंने रजत पदक हासिल कर दुनिया को अपनी प्रतिभा का परिचय दिया। अक्टूबर 2026 में एशियन पैरा गेम्स में उन्होंने डिस्कस थ्रो की स्पर्धा में भी स्वर्ण पदक जीतकर नया एशियाई रिकॉर्ड बनाया।