22 जुलाई भारतीय अंतरिक्ष इतिहास की उन तारीखों में शामिल है, जिसने देश के अंतरिक्ष कार्यक्रम को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया। आज ही के दिन वर्ष 2019 में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने अपने दूसरे चंद्र मिशन चंद्रयान-2 को श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से सफलतापूर्वक लॉन्च किया था।
इसके बाद कई पृथ्वी-कक्षा संचालन (Earth Bound Manoeuvres) पूरे किए गए और 14 अगस्त 2019 को अंतरिक्ष यान ने लूनर ट्रांसफर ट्रैजेक्टरी (LTT) में प्रवेश किया।
इसके बाद 20 अगस्त 2019 को लूनर ऑर्बिट इंसर्शन (LOI) सफलतापूर्वक किया गया, जिससे चंद्रयान-2 चंद्रमा की दीर्घवृत्ताकार कक्षा (Elliptical Orbit) में स्थापित हो गया। इसके बाद कई चंद्र-कक्षा संचालन किए गए, जिनकी मदद से अंतरिक्ष यान को धीरे-धीरे 100×100 किलोमीटर की ध्रुवीय वृत्ताकार कक्षा में पहुंचाया गया।
यह मिशन सिर्फ चंद्रमा तक पहुंचने की कोशिश नहीं था, बल्कि भारत की वैज्ञानिक क्षमता, आत्मनिर्भर तकनीक और भविष्य के अंतरिक्ष अभियानों की मजबूत नींव भी था।
भारत का सबसे महत्वाकांक्षी चंद्र मिशन
चंद्रयान-2 को GSLV Mk-III M1 रॉकेट के जरिए 22 जुलाई 2019 को दोपहर 2:43 बजे प्रक्षेपित किया गया। कई पृथ्वी कक्षीय प्रक्रियाओं के बाद अंतरिक्ष यान ने 20 अगस्त 2019 को चंद्रमा की कक्षा में सफलतापूर्वक प्रवेश किया।
इस मिशन में तीन प्रमुख हिस्से शामिल थे-
इनका उद्देश्य चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव क्षेत्र का अध्ययन करना था, जहां पहले किसी देश ने सफलतापूर्वक सॉफ्ट लैंडिंग नहीं की थी।
विक्रम लैंडर से संपर्क टूटा, लेकिन मिशन नहीं रुका
2 सितंबर 2019 को विक्रम लैंडर ऑर्बिटर से सफलतापूर्वक अलग हुआ। इसके बाद डी-ऑर्बिटिंग प्रक्रिया के जरिए इसकी कक्षा को घटाकर 35×101 किलोमीटर किया गया।
7 सितंबर 2019 को विक्रम की सॉफ्ट लैंडिंग का प्रयास किया गया। लैंडर ने निर्धारित योजना के अनुसार 35 किलोमीटर की ऊंचाई से उतरना शुरू किया और लगभग 2 किलोमीटर की ऊंचाई तक सभी प्रणालियां सामान्य रूप से कार्य करती रहीं। इसी दौरान लैंडर और ग्राउंड स्टेशन के बीच संपर्क टूट गया।
हालांकि, संपर्क टूटने से पहले तक लैंडर के सभी सिस्टम और सेंसर उत्कृष्ट रूप से कार्य कर रहे थे और उन्होंने वेरिएबल थ्रस्ट प्रोपल्शन टेक्नोलॉजी जैसी कई नई तकनीकों को सफलतापूर्वक प्रमाणित किया। वहीं, चंद्रयान-2 का ऑर्बिटर पूरी तरह स्वस्थ रहा और उसके सभी वैज्ञानिक उपकरण सफलतापूर्वक कार्य करते रहे।
कई अहम वैज्ञानिक उपलब्धियां
मिशन के दो वर्ष पूरे होने पर ISRO ने चंद्रयान-2 के वैज्ञानिक पेलोड्स से प्राप्त महत्वपूर्ण निष्कर्षों को सार्वजनिक रूप से साझा किया।
CHACE-2 ने पहली बार चंद्रमा के मध्य-अक्षांश (Mid-Latitude) क्षेत्रों में आर्गन-40 (Argon-40) गैस के वितरण का विस्तृत अध्ययन किया। इसके अलावा दक्षिणी ध्रुव-ऐटकेन (South Pole-Aitken) क्षेत्र तथा KREEP क्षेत्र में इसकी अधिक मात्रा दर्ज की गई, जिससे चंद्रमा की सतह और उसके एक्सोस्फियर के बीच होने वाली प्रक्रियाओं को बेहतर ढंग से समझने में मदद मिली।
वहीं TMC-2 ने चंद्रमा पर मौजूद लॉबेट स्कार्प (Lobate Scarp) जैसी भूगर्भीय संरचनाओं का उच्च-रिज़ॉल्यूशन मानचित्र तैयार किया, जिससे चंद्रमा की भूगर्भीय गतिविधियों के बारे में नई जानकारी प्राप्त हुई।
XSM ने सूर्य पर आने वाले कई छोटे B-क्लास सोलर फ्लेयर्स का अध्ययन किया और पहली बार इन फ्लेयर्स के दौरान मैग्नीशियम, एल्यूमिनियम, सिलिकॉन और सल्फर जैसे तत्वों की मात्रा में होने वाले बदलावों का विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत किया। इससे सूर्य के कोरोना और सौर गतिविधियों को समझने में वैज्ञानिकों को महत्वपूर्ण सहायता मिली।
चंद्रयान-3 की सफलता की बनी मजबूत नींव
चंद्रयान-2 से मिले अनुभव और तकनीकी सीख ने भारत के अगले मिशन चंद्रयान-3 की सफलता की राह तैयार की। 2023 में भारत ने चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के पास सफल सॉफ्ट लैंडिंग कर इतिहास रच दिया और ऐसा करने वाला दुनिया का पहला देश बना।
आज भी प्रेरणा है चंद्रयान-2
लॉन्च के सात साल बाद भी 22 जुलाई भारतीय विज्ञान और तकनीक के इतिहास में गर्व का दिन माना जाता है। चंद्रयान-2 ने यह साबित किया कि विज्ञान में हर प्रयास सफलता की ओर एक मजबूत कदम होता है। यही मिशन आगे चलकर भारत को चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव तक पहुंचाने की सबसे बड़ी प्रेरणा और आधार बना।